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पुष्य

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पुष्य नक्षत्र:- पुष्य नक्षत्र महाराज पृथु केअश्वमेध यज्ञ श्री विष्णु भगवान का प्रादुर्भाव महाराज पृथु का का अपनी प्रजा को उपदेश महाराज पृथु को सनकादि का उपदेश राजा पृथु की तपस्या और परलोक गमन प्रचेताओ को भगवान रूद्र का उपदेश ŚB 10.87.21 दुरवगमात्मतत्त्वनिगमाय तवात्ततनो- श्चरितमहामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणा: । न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहा: ॥ २१ ॥ My Lord, some fortunate souls have gotten relief from the fatigue of material life by diving into the vast nectar ocean of Your pastimes, which You enact when You manifest Your personal forms to propagate the unfathomable science of the self. These rare souls, indifferent even to liberation, renounce the happiness of home and family because of their association with devotees who are like flocks of swans enjoying at the lotus of Your feet. भगवान!परमात्मा तत्व का ज्ञान प्राप्त करना अत्यंत कठिन है,उसी का ज्ञान कराने के लिए आप विभिन्न प्रकार के अवतार ग्रहण करते हैं और उनके द्वारा ऐसी लीला करते हैं,जो अमृत के महासागर से

18पृथु के यज्ञ

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23राजा पृथुकी तपस्या और परलोकगमन

 राजा पृथुकी तपस्या और परलोकगमन 

24 रुद्रगीत पृथुकी वंशपरम्परा और प्रचेताओंको भगवान् रुद्रका उपदेश

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! महाराज पृथुके बाद उनके पुत्र परम यशस्वी विजिताश्व राजा हुए⁠। उनका अपने छोटे भाइयोंपर बड़ा स्नेह था, इसलिये उन्होंने चारोंको एक-एक दिशाका अधिकार सौंप दिया ⁠।⁠।⁠१⁠।⁠। राजा विजिताश्वने हर्यक्षको पूर्व, धूम्रकेशको दक्षिण, वृकको पश्चिम और द्रविणको उत्तर दिशाका राज्य दिया ⁠।⁠।⁠२⁠।⁠। उन्होंने इन्द्रसे अन्तर्धान होनेकी शक्ति प्राप्त की थी, इसलिये उन्हें ‘अन्तर्धान’ भी कहते थे⁠। उनकी पत्नीका नाम शिखण्डिनी था⁠। उससे उनके तीन सुपुत्र हुए ⁠।⁠।⁠३⁠।⁠। उनके नाम पावक, पवमान और शुचि थे⁠। पूर्वकालमें वसिष्ठजीका शाप होनेसे उपर्युक्त नामके अग्नियोंने ही उनके रूपमें जन्म लिया था⁠। आगे चलकर योगमार्गसे ये फिर अग्निरूप हो गये ⁠।⁠।⁠४⁠।⁠। अन्तर्धानके नभस्वती नामकी पत्नीसे एक और पुत्र-रत्न हविर्धान प्राप्त हुआ⁠। महाराज अन्तर्धान बड़े उदार पुरुष थे⁠। जिस समय इन्द्र उनके पिताके अश्वमेध-यज्ञका घोड़ा हरकर ले गये थे, उन्होंने पता लग जानेपर भी उनका वध नहीं किया था ⁠।⁠।⁠५⁠।⁠। राजा अन्तर्धानने कर लेना, दण्ड देना, जुरमाना वसूल करना आदि कर्तव्योंको बहुत कठोर एवं दूसरोंके लिये कष्टदायक समझकर एक

22 सनकादि का उपदेश

 जब तक अंतःकरण रूप उपाधि रहती है,तभी तक पुरुष को जीवात्मा, इंद्रियों के विषय और इन दोनों का संबंध कराने वाले अहंकार का अनुभव होता है;इसके बाद नहीं।।28  बाह्य जगत में भी देखा जाता है कि जल्, दर्पण आदि निमित्तों के रहने पर ही अपने बिंब और प्रतिबिंब का भेद दिखाई देता है; अन्य समय नहीं।।29

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  पुष्य नक्षत्र:- पुष्य नक्षत्र महाराज पृथु केअश्वमेध यज्ञ महाराज पृथु केअश्वमेध यज्ञ श्री विष्णु भगवान का प्रादुर्भाव महाराज पृथु का का अपनी प्रजा को उपदेश महाराज पृथु को सनकादि का उपदेश महाराज पृथु को सनकादि का उपदेश राजा पृथु की तपस्या और परलोक गमन राजा पृथुकी तपस्या और परलोकगमन   पृथुकी वंशपरम्परा और प्रचेताओंको भगवान् रुद्रका उपदेश